Sunday, June 24, 2007

हाइकु कविताएँ

नीर कणों ने
बिखेर दिया जादू
भू-मंच पर ।


टिपटिपाती
बूँदें बरसात की
नया संगीत ।


धरा श्रृंगार
स्वीकार कर लिया
नीर कणों ने ।


धरा ने ओढ़ी
चादर सुनहली
नई उषा की ।


देश की शान
विश्व में पहचान
भाषा हिन्दी की ।


सूखे दरख्त
समाज के बंधन
सींचेगा कौन ।


आज के नेता
देश के पौधे पर
अमरबेल ।


प्रजातंत्र में
मानव अभिमत
देश का सत ।


महिला रक्षा
नई ढपली हेतु
पुराना राग ।


शिक्षा का रथ
सारथी के अभाव
बढेग़ा कैसे।


रात-दिन की
मिलन मनुहार
संध्या के द्वार ।



आज की शिक्षा
बिना नींव का एक
ऊंचा भवन ।


अभिनंदन
धरती के रूप का
किया वर्षा ने।


प्रकृति नारी
हरित श्रृंगार में
मोहक लगे ।


समय चक्र
परिवर्तन कर
नजारा देखे।


हाय मानव
पहचान खो गई
इस युग में ।


फूले कास ने
हथेली फैलाकर
समेटी खुशी ।



ये कैसे पर
दिल में हलचल
तुम्हारे बिना ।



ढलती रात
दरिया से कहती
विदा ले हम ।



समय चक्र
बदलती दुनियां
मानव कहां ?



बिना अधूरी
सोलह श्रृंगार के
चॉंदनी रात ।

-संजय कुमार सराठे

3 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 19/06/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर