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Friday, March 10, 2006

आओ मनाएँ होली

बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !

सूखे पलाश ने गुपचुप-गुपचुप
फैला दी रंगों की झोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !

इतराते आमों पर सौंधी खुशबू
बौरों की लगी बिखरने चोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !


पप्पू-मुन्नी रीना-टीना मनाए खुशियाँ
पिचकारी भर-भर रगों की गोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !


क्ल-कल झरना बोला-कहाँ चली
ओ पवन मतवाली लेकर अपनी टोली,
बासंती परिवेश मे आओ मनाएँ होली !


भेदभाव को छोड़ हम मिल जुलकर
तिलक करें अटूट रिश्तों की रोली,
बासंती परिवेश में आओ मनाएँ होली !




-डा० संजय कुमार सराठे



तुम याद आना

तुम याद आना
यादों के समंदर में
आँसू सी लहर बन
मन की कोमल बगिया के
तरु को सिंचित कर
प्रीति के सुमन खिला जाना
तुम याद आना तुम याद आना

घोर अँधेरी रातों में
जुगुनू–सी चमक बन
नीरवता के वितान में
पायल की झनकार से
मधुमय अहसास दिला जाना
तुम याद आना
तुम याद आना


***


-डा० संजय कुमार सराठे